Sunday, July 27, 2008
ना काबलियत का मुलम्मा
लो जी फिर आतंक वादियों ने हम पर हमला कर हमें खुली चुनोती दे दी है। और हमारे राजनेता देने लगे उनको गालियाँ। क्या करे बेचारे इससे ज्यादा कुछ करने की हिम्मत भी तो नहीं। और हिम्मत हो भी कैसे सकती है। हालही तो पैसे देकर संसद में आ सके हैं। क्या हो हमारी नाकाम पुलिस और और खुफिया एजेंसी का जिनको देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार बनाया हुआ है। हमारे देश का दुर्भाग्य देखिये की आतंकवादी यहाँ जेल में भी दामाद की तरह मौज करते हैं। और कश्मीर के कुछ नेता अफजल को छोड़ने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे में पैसे से ख़रीदे नेता क्या दुम नहीं दबा लेंगे। ना काबिल लोगों ने पैसे के बल पर काबलियत का मुलम्मा जो चढाया है। फिर बम विस्फोट हो, कोई मरे, कोई घायल हो। अपन सलामत अपनी कुर्शी सलामत। और चाहिए भी क्या। आख़िर कुर्शी जो खरीद ली है भाई। और कोई मरेगा तो उसके घरवालों को भी मदद के नाम पर पैसा दे देंगे। चलो हो गया भेडा पार। फिर जेल में बंद दामादजी बमफोडे, गोलियां चलायें, या किसीको मारे। इनको कोई दर्द नहीं। कोई पीडा नहीं। क्योंकि सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ता हमारा। फिर मिलेंगे चुनावो मे जय सियारामकी। इसलीये ही तो कहते हैं मेरे भाई ।
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